जीविका

राष्ट्र की सम्प्रभुता की रक्षा हेतु

भारतीय विचार दर्शन पर आधारित अखिल भारतीय संगठन




संसार में जो अर्थव्यवस्था चलता है, उसका केन्द्र बिन्दु जीविका है।वस्तु का निर्माण - विनिमय (उत्पादन-विपणन एवं वितरण) या अन्य कोई व्यवहार या सेवा; किसी भी क्षेत्र में जीविका देने या लेने वालों की आवश्यकता या जरूरत पुरी करना, इसी हेतु "जीविका" संगठन कार्य करता है।


अर्थव्यवस्था का केन्द्र बिन्दु मात्र जीविका होते हुए भी आज जीविका चलाने वालों की अपनी शक्ति का परिचय भी नहीं है, यह दुर्भाग्य की बात है क्योंकि यह दुनिया से अलग अर्थव्यवस्था वाला यह राष्ट्र केवल पूँजी उन्मुक्त न होकर रोजगार उन्मुक्त है। जनतांत्रिक अर्थव्यवस्था को सुचारू लाने की दिशा में उचित परिवर्तन होना आवश्यक है। यह सुधार लाने के इरादे से जीविका एक जनआन्दोलन के रूप में क्रियाशील है। इसलिए हमारी मान्यता है कि देश के प्रत्येक नागरिक को उसकी योग्यतानुसार जीविका मिलनी चाहिए। हमारा संगठन मंत्र की यही उद्‌घोषणा है- "मनुष्य को पंगु और बौना बनाने वाली गरीबी मिटे, जीविका के लिए जीवन रेहन न रखना पड़े, रोटी इंसान को न खायें।"


आज हर क्षेत्र में जीवका हेतु लोग ठगे जा रहे है, इसका कारण अज्ञानता तो है ही, उसकी जल्दबाज जीवनशैली तथा बाजारवाद भी कारण है। जीविका का उद्देश्य आदमी का आदमी के द्वारा किये जाने वाले शोषण को रोकना है। असंगठित जीविका को उनके अधिकार समझना, आर्थिक लुटखसोट के विरूद्ध असंगठित जीविका शक्ति बड़ा करना और भारत की सम्प्रभुता के लिए स्वयं की प्रेरणा से परस्परपूरक विश्वास जीविका को जीविका के काम में लगाना इन लक्ष्यों को लेकर जीविका पूरे देश में काम कर रही है।


संगठन क्या करेगा?

जीविका मात्र संगठन करेगा, कार्यकर्ता सबकुछ करेगा।


अपनी समस्यायें सुलझाने के लिए जीविका संगठन सभी जीविका को समर्थ बनायेगा। सभी जीविका को संगठित रूप से शोषित जीविका के पीछे खड़ा करेगा। शोषितों को यह महसूस करायेगा की जीविका में खड़ी हुई छोटी-मोटी समस्याओं के कारण की पहचान कर उसके समाधान हेतु निरंतर अभ्यास का आयोजन जीविका द्वारा किया जायेगा।


यहाँ सर्वप्रथम सामंजस्य चर्चा और संवाद के माध्यम से समस्या सुलझाने का प्रयास होता है।


जीविका संगठन अपने सदस्यों और अपने कार्यकर्ताओं के लिये कुछ अपेक्षा नहीं करता। संगठन के वैचारिक सूत्रों के आधार पर एक ऐसी कार्यशैली अपनायी गयी है जिसे इस देश की पूरी जीविका और अर्थ व्यवस्था समुचित रास्ते से चले।



सिद्धांत


शोषणमुक्त अर्थव्यवस्था का मूल आधार शोषण विरहित, दक्ष, जीविका मुलधारी संगठन ।


धर्म, अर्थ काम, मोक्ष ऐसे चार पुरुषार्थी के समुचित आधार पर समाज रचना । (आज अर्थप्रधान संस्कृति के दोषो के कारण अर्थ उन्नत हो गया है।) सामाजिक संतुलन बिगड़ गया है।


“जीविका”  बेरोजगारो - रोजगारों का ट्रेड यूनियन नहीं है। हम जीविका पंचक मानते है। किसान, कर्मचारी, व्यापारी, उत्पादक, स्वावलम्बन यानि जीविका इन सभी में परस्पर समन्वय हो, संघर्ष नहीं।


रोजगार एवं बेरोजगार शब्द की अपेक्षा जीविका शब्द का अर्थ व्यापक है। जो केवल माँग कर कार्य को सहर्ष एवं खरीदकर कार्य करता है वह बेरोजगार कहलाता है। मन, शरीर, बुद्धि और आत्मा से जो स्वीकार करता है वही जीविका है।


जीविका समाज की आर्थिक समरसता का अभियान है। अर्थव्यवस्था के सभी चिंतनो के केन्द्र में केन्द्रीकृत व्यवस्था न होकर विकेन्द्रीकृत हो। अर्थव्यवस्था के चिंतनकेन्द्र में पूँजीपति/उत्पादक नहीं बल्कि जीविका है।


हमारा विचार व्यापक है। हम सर्वविध संक्रीयता की परिधि से बाहर है।


कृषि आधारित स्वदेशी के बल पर जीविका केन्द्रित समाज रचना का लक्ष्य ।


भारतीय दर्शन के आधार पर व्यष्टि, समष्टि, सृष्टि, परमेष्टि के क्रम से विकास की दिशा है।


अर्थशास्त्र के सभी चिंतनों के केन्द्र में पूँजीवाद नहीं, बल्कि जीविका है।




जीविका

जी-जीवन Life पूर्ण जीवन

वि- विकास Development पूर्ण विकास

का-कार्यक्रम Programme संपूर्ण कार्यक्रम

संपूर्ण सुख क्या है ?

*इंद्रिय सुख *मन का सुख   *बौद्धिक सुख   *आत्मा का सुख

जब तक चारों सुख नहीं मिलेगा, तब तक टुकड़ों में सुख मिलेगाकिंतु कुछ लोगों में चेतना नहीं / भ्रम रहने पर इसे पूर्ण सुख मान लेते हैं सभी तरह के समस्या समाधान हमारे हिंदू सनातन संस्कृति में है ।  इसलिए हम लोग भोजन मजा के लिए नहीं ग्रहण करते हैं बल्कि ऊर्जा को प्राप्त करने के लिए करते हैं


अपनी संगठन का घोष वाक्य है । - 


"जीविका" मात्र संगठन करेगा ! 

कार्यकर्ता सब कुछ करेगा !!